पूर्व कर्म

पूर्व-कर्म

1. स्नेहन- स्नेह शब्द का तात्पर्य शरीर को स्निग्ध करने से है। यह स्नेह क्रिया शरीर पर बाह्य रूप से तेल आदि स्निग्ध पदार्थों का अभ्यंग (मालिश) करके भी की जाती है तथा इन पदार्थों का मुख द्वारा प्रयोग करके भी की जाती है। कुछ रोगों की चिकित्सा में स्नेहन को प्रधान कर्म के रूप में भी किया जाता है।

चार प्रमुख स्नेह

(1) घृत, (2) मज्जा, (3) वसा, (4) तेल

इनमें घृत (गोघृत) को उत्तम स्नेह माना गया है। ये चारों स्नेह मुख्य रूप से पित्तशामक होते हैं।

2. स्वेदन- स्वेदन का तात्पर्य उस प्रक्रिया से है, जिससे स्वेद अर्थात पसीना उत्पन्न हो। कृत्रिम उपायों द्वारा शरीर में स्वेद उत्पन्न करने की क्रिया स्वेदन कहलाती है।

स्वेदन के भेद-

(अ) 1. एकांग स्वेद- अंग विशेष का स्वेदन

2. सर्वांग स्वेद- संपूर्ण शरीर का स्वेदन

(ब) 1. अग्नि स्वेद- अग्नि के सीधे संपर्क द्वारा स्वेदन

2. निरग्नि स्वेद- बिना अग्नि के संपर्क द्वारा स्वेदन।

पंचकर्म है शरीर की अंदरूनी सफाई