जडीबुटी

नपुंसकता -अकरकरा

यह झाड़ीदार रोम युक्त क्षुप होता है इसके पर ग्रंथिया होती है जड़ ३-४ इंच लम्बी होती है पुष्प श्वेत ,बैंगनी ,पीले रंग के होते है 

यह पक्षाघात ,नसों की कमजोरी ,में तेल का प्रयोग करते है 

इसका प्रयोग दांत शूल ,विद्रधि ,वेदना में भी होता है 

पीनस,प्रतिश्याय में नस्य देते है 

ध्वंज भंग ,शीघ्र पतन में एक मूल प्रयोग करते है 

हड्डी जोड़ने की बेजोड़ दवा -अस्थि श्रंखला

यह पर्व युक्त लम्बी, मांसल लता होती है इसका तना हरा ,चतुष्कोण होता है 

पत्र कम ,ह्रदय की आकृति के ३-५ भागों में बटे रहते है 

पुष्प छोटे हरे श्वेत वर्ण के गुच्छों में होते है 

फल गोल, लाल ,रसदार ,मटर के बराबर एकबीजी होते है 

फूल बर्षा में तथा फल शीत काल में आते है 

श्री लंका व दक्षिण भारत में इसका शाक खाया जाता है 

यह भारत के उष्ण भागों में पाया जाता है 

इसमे प्रोटीन ,बसा ,कार्बोहायड्रेट ,राख,मुसिलेज ,पेक्टिन ,विटामिन्स पाए जाते है 

इसकी भस्म में सोडियम ,पोटासियम ,मग्निसियम ,कैल्शियम के कार्बोनेट व फॉस्फेट पाए जाते है 

मूत्र रोगों की अचूक दवा -खस /उशीर

खस गाडर नाम के त्रण की जड होती है इसका पौधा २-५ फुट उचा होता है पत्र १-२ फुट लम्बे होते है पुष्प दण्ड४-१२ इंच लम्बा होता है बर्षा में  पुष्प व फल लगते है इसकी जड़ो में सुंगध होती है जो सुखाने के साथ बड़ती है सुखी जड़ो को जल में भिगोने पर सुगन्ध निकलती है 

खस विशेष रूप से दक्षिण भारत ,बंगाल ,राजस्थान ,नागपुर व जल स्रोतों के पास पाया जाता है 

इसमे उड़नशील तेल ,राल,रंग द्रव्य ,अम्ल ,चुना ,लोहा होता है 

शीत गुण के कारण मुत्रजनन करता है 

यह कफ पित्तजन्य विकारो में लाभ देता है 

दाह ,चर्म रोग ,और अति स्वेद में लेप लाभ देता है 

आयुर्वेदिक वियाग्रा -मूसली

यह एक भुशाखायुक्त कांटे युक्त क्षुप है इसका काण्ड लम्बा ,गोल ,मजबूत ,चिकना व श्वेत होता है पत्रों की लम्बाई १/२ -२ इंच ,६-२० की संख्या में एक साथ गुच्छों में होते है पुष्प मंजरिया अनेक १-२ इंच लम्बी ,ऊपर के भाग पर विभक्त व पत्र युक्त होती है जिसमे १/६ फल  इंच व्यास के पुष्प लगे होते है फल  १ /४ इंच व्यास के एकबीजी होते है मूल स्तम्भ से श्वेत ,लम्बे गोल रोम युक्त मुलो का गुच्छा निकलता है यह पिच्छिल होते है व जल में डालने पर फूल जाते है 

मूसली दो प्रकार की होती है 

१ .श्वेत 

२ .कृष्ण 

पाषाणभेद -गुर्दे के पथरी की रामबाण ओषधि

इसे हिन्दी में पखानभेद कहते है यह छोटा क्षुप है जो पहाड़ की चट्टानों पर फैला रहता है इसकी जड रक्त वर्ण ,मोटी,व १ -२ इंच लम्बी होती है पत्र गोल व ५ -१० इंच व्यास के ,मांसल ,किनारों पर दांत ,ऊपर का भाग हरा व नीचे का रक्त वर्ण का होता है पुष्प श्वेत ,गुलाबी व अप्रैल -मई में आते है 

यह ७ -१० हजार फीट  की उचाई पर हिमालय में कश्मीर से भूटान तक के पहाड़ो पर पाया जाता है 

इसमे टेनिक एसिड ,गेलिक एसिड ,स्टार्च ,खनिज लवण,मेताब्रिन,एल्युमीनियम ,ग्लूकोस ,पिच्छिल द्रव्य, मोम,सुगन्धित द्रव्य होते है 

गुर्दे की पथरी की रामबाण ओषधि-वरुण

वरुण का वृक्ष २५ -३० फुट ऊँचा होता है इसकी छाल धूसर वर्ण की व तिक्त होती है पत्र ३-५ इंच लम्बे होते है पत्तो को मसलने पर एक प्रकार की तीक्ष्ण गंध आती है फूलो का रंग श्वेत ,पीला, बैंगनी,होता है यह पुंकेसर युक्त व सुगन्धित होते है फल नीबू के समान १ इंच व्यास के ,पकने पर लाल हो जाते है फल जून में आते है वरुण समस्त भारत में पाया जाता है इसकी छाल में सैपोनिन व टेनिन पाया जाता है 

वरुण कफवात शामक व पित्त्वर्धक होता है अश्मरी ,मुत्रक्रच्छ ,वस्ति शूल ,मूत्र मार्ग सक्रमण में वरुण की छाल का प्रयोग क्वाथ बनाकर ५० -१०० मिलीलीटर प्रयोग करते है 

पुनर्नवा -गुर्दे व पीलिया की रामबाण ओषधि

हिन्दी में पुनर्नवा को गदहपूरना कहते है यह २-३ फूट लम्बा क्षुप होता है इसके पत्र १-२ इंच लम्बे ,गोलाकार या अंडाकार ,मांसल होते है पुष्प गुलाबी, श्वेत होते है बर्षाकाल में पुष्प व फल आते है यह समस्त भारत में पाया जाता है 

पुनर्नवा का प्रयोग विशेष रूप से ह्रदय रोग ,शोथ ,रक्ताल्पता ,रक्तप्रदर ,मुत्रक्र्च्छ ,मुत्रजनन में होता है 

प्रयोज्य अंग ;मूल,बीज,पञ्चांग

गुर्दा फेल की रामबाण दवा --गोखरू

गुर्दा

गुर्दा फेल होने पर रोगी के शरीर से विषाक्त पदार्थ बहार नहीं निकल पाते है इनमे मुख्य रूप से रक्त में यूरिया व क्रेटीनाइन का बढना प्रारंभ हो जाता है जिसमे सम्पूर्ण शरीर पर सुजन आ जाती है विशेष रूप से चेहरे ,हाथों,पैरों पर सुजन आती है रोगी की कुछ समय के बाद साँस फूलने लगती है मूत्र की मात्रा सामान्य से कम हो जाती है पेट में दर्द होने लगता है रोगी कमजोरी महसूस करने लगता है रक्त में हिमोग्लोविन की मात्रा कम होने लगती है गुर्दा का फेल होना २ प्रकार से होता है 

1.A.R.F.एक्यूट रीनल फैलुर ;-गुर्दा अचानक फेल होता है 

साइटिका/ग्रध्रंसी/डिस्क स्लिप/spondolytis की अचूक दवा हरसिंगार/पारिजात

 साइटिका/ग्रध्रंसी/डिस्क स्लिप/spondolytis की अचूक दवा हरसिंगार/पारिजात

इस कों नाईट जास्मीन भी कहतें है इसका बोटैनिकल नाम nyctanthes arbortristis है इसकीऊचाई १५-३० फीट होती है इसके पत्तो का स्बरस  १०-२० मिली लीटर पीने से नसों/nerves का शोथ कम होता है तथा साइटिका और नसों के दर्द में रामबाण के समान काम  करता है

इसके अलावा हरसिंगार पाचन संस्थान ,रक्तबह संस्थान,श्वसन संस्थान मूत्र बह संस्थान में कार्य करता है

हल्दी के प्रयोग से रहें निरोग

हल्दी के प्रयोग से रहें निरोग

हमारे किचन में एक मसाले के रूप में व्यवहृत हल्दी  अपने भीतर सैंकडों  आरोग्यकारी गुण समाविष्ट किये हुए है | नीचे  पूरा वर्णन  दिया जा रहा है-- 
सौन्दर्यवर्धक

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